Monday, January 18, 2010

किसे सुनाएँ हाले-दिल़....

अब तो खामोशी भली,लब़ पे लगालें ताला।
किसे सुनाएँ हाले-दिल़,कौन सुनने वाला।।

चन्द सिक्कों की खनक़ में,सभी हुए बहरे।
दौड़ती-भागती दुनियाँ, कहाँ जाने ठहरे।
अभी ये सिल़सिला,लगता नहीं रुकने वाला।। किसे सुनाएँ...

जिसे भी देखिये,हक़ से ज़ियादे की धुऩ है।
किसे बेचें,क्या खरीदें, यही उधेड़-बुऩ है।
ऐसे बेचैनी के आलम़ में,कौन फुर्सत् वाला।। किसे सुनाएँ...

मरते ज़मीर,उसूल, गैरतो-ज़ज्बात् मिले।
महात्वाकांकांक्षा,कपट और स्वार्थ साथ मिले।
फ़ायदे के लिये,सबकुछ यहाँ बिकने वाला।। किसे सुनाएँ...

प्रेम-सद़्भाव,नैतिकता, इन्सानिय़त् न कहीं।
दिल़ की बस्ती में वीराना है,कोई आहट़ न कहीं।
है यहाँ कौन तेरा दर्द समझने वाला।। किसे सुनाएँ...

छोड़ो बेदर्द़ ज़माने से ग़िला क्या करना।
बेज़ान बुत़् में ज़िन्दगी तलाश़ क्या करना।
..गोपाल..इन पत्थरों में दिल़ नहीं मिलने वाला।। किसे सुनाएँ...

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