Saturday, July 18, 2015

अब वो क़सीदा नहीं रहा.............

जुमलों में उनके,अब वो क़सीदा नहीं रहा।
लगता है उनको, ख़ुद पे अक़ीदा नहीं रहा ।।

जो लोग पिछड़ जाते हैं, रफ्तारे-वक़्त से ।
दुनियाँ उसे कहती है, तरीक़ा नहीं रहा  ।।

नज़रें जो बदलता है, नज़ारों के संग-संग।
ये वक़्त गवाह है , वो कहीं का नहीं रहा  ।।

कुछ तो उसूल हों , ज़िन्दग़ी के वास्ते  ।
अब वक़्त एक सा तो किसी का नहीं रहा।।

ये कौन सा दस्तूर, बना रक्खा है हमने।
मतलब के बिना कोई, किसी का नहीं रहा।।

हमने तो सुना है कि, ज़र्रे-ज़र्रे में रब है।
हममें ही, देखनें का सलीक़ा नहीं रहा ।।

इंसान ही, इंसानियत् का फ़र्ज़ न समझे।
,,गोपाल,, ये तरीक़ा- तरीक़ा नहीं रहा  ।।

Wednesday, October 8, 2014

ज़िन्दगी का तज़ुर्बा.......................

ज़िनदग़ी का तज़ुर्बा ,  यूँ तो, हमें चौंका गया  ।
रफ्ता-रफ्ता जाने कैसे, फिर भी जीना आगया।।

ठोकरों पे ठोकरें खाई ,  संभल कर चल दिये ।
इस बहाने ख़ुद ही ख़ुद को, आजमाना आगया।।

हरक़तें यूँ तो , ज़माने ने बहुत की मेरे साथ  ।
पर हमें भी,इसके चलते,ज़ख़्म खाना आगया।।

साथ चलने को कहा ,हमको भी चलते वक़्त ने।
हमने बोला रहने दे,अब बस् यही रास आगया।।

बेअदब जो बेमुरौवत,बेलियाक़त् ,बेलिहाज़।
वो हमें तहज़ीब देते , क्या ज़माना आगया ।।

उम्र भर जो ख़ुद  , ज़माने में रहे हैं बेशऊर  ।
क्या कहें, उन बन्दरों को भी सिखाना आगया।।

कर अदावत् , देखता हूँ , कितनी तुझमें ताव है ।
उसको क्या, सबको जिसे, अपना बनाना आगया।।

सीखने के वास्ते, निकले थे कुछ इल्मो-हुनर ।
शुक्रिया ,,गोपाल,, तुमको दिल दुखाना आगया।।

Sunday, June 22, 2014

ख़ुद अपने आप से.......................................

ख़ुद  अपने  आप  से, मैं  छूटता  सा  जारहा  हूँ।
कहीं  भीतर  ही  भीतर,  टूटूता  सा  जारहा  हूँ ।।

तमाम शैलाबों में घिरकर,निकल आई क़िश्ती।
आके साहिल पे, पर अब डूबता सा जारहा हूँ ।।

भीड़  की  ग़र्दिशों  में,  हर  तरफ़  तनहाई  है ।
कहाँ हूँ मैं, कि ख़ुद को  ढूढ़ता सा जारहा  हूँ ।।

कहें क्या, किस क़दर आलूदगी  फैली हर सू ।
एक-एक साँस को , मैं जूझता सा जारहा हूँ ।।

चन्द ताज़ी हवा के क़तरे, बख़्श दे मालिक ।
 अब तो बस् हद् हुई, दम घोंटता सा जारहा हूँ।।

मिटा  आलूदगी ,  या  मेरा  फैसला  करदे  ।
हूँ तो मिट्टी ही आख़िर, फूटता सा जारहा हूँ।।

अब तो हर दिन, ग़ुज़र रहा है इस तरह मानो।
कि जैसे, ख़ुद ही ख़ुद को लूटता सा जारहा हूँ ।।

न  देना  दोष  मुझे , मेरे  बदल  जाने  पर  ।
,,गोपाल,, था मैं,पर अब बदलता सा जारहा हूँ।।

Saturday, June 21, 2014

ज़मीं से लग के चलो........................

ज़मीं से लग के चलो,हमक़दम ज़मीं होगी।
हर जगह  आसमाँ नहीं, मग़र ज़मीं होगी ।।

तू इक़ पौधा था, जिसे अब दरख़्त कहते हैं ।
तेरी रग़ों में भी, धरती की ही नमीं होगी  ।।

अपनी ऊँचाईयों पर,इतना तू अभिमान न कर।
देख  नीचे , तुझे  थाम्हे  हुए ,  ज़मीं  होगी  ।।

हवा  के  ज़ोर  पर,  पत्ते  भी  शोर  करते  हैं।
तनिक आँधी चली, तो साख़ भी नहीं होगी ।।

साख़ से छूट कर, कब  तक  हवा  में  ठहरेगा ।
उसकी भी मुस्तक़बिल,आख़िर यही ज़मीं होगी।।

खींचती रहती है, हर चीज़ को अपनी जानिब ।
किसे दामन में जगह, इसनें  दी  नहीं  होगी  ।।

उठ के मिट्टी से, फिर मिट्टी में ही मिल जाना है।
,,गोपाल,, चाहे कितनी  भी  बड़ी  हस्ती  होगी ।।

Saturday, November 16, 2013

याद तो करो..............

हम याद बहुत आएंगे,तुम याद तो करो।
कोई लम्हाँ मेरे नाम पे, बर्बाद तो करो ।।

रिश्ते में अपने थोड़ा सा एहसास अभी है।
कुछ जान फूँक कर, इसे आबाद तो करो ।।

तुमसे हुई क्या भूल, कहाँ चूक गये हम।
सब भूल कर,फिर से नई शुरुआत् तो करो।।

दिल में अगर जुनूँ है,तो आएगा इन्क़लाब।
नीयत से इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद तो करो ।।

मायूस निगाहों से, आसमाँ को न देखो।
होगी दुआ क़ुबूल,कि फ़रियाद तो करो।।

..गोपाल.. लाख दूर सही,मन्ज़िले-सफ़र।
अन्जाम तक जाना हे ग़र, आग़ाज़ तो करो।।



Thursday, November 14, 2013

क्या किया जाए............

बहुत बदल गये हालात् ,क्या किया जाए।
अब नहीं रह गयी वो बात् ,क्या किया जाए।।

कहाँ रही वो लियाक़त् ,वो उसूलो-अदबो- लिहाज।
न वो एहसास, न जज़्बात् , क्या किया जाए  ।।

कहाँ से लाया जाए ढूंढ के,तहज़ीबो-तमीज़।
बड़े बेक़द्र ख्यालात् , क्या किया जाए  ।।

फ़ायदे पर ही मुनहसर हुआ अब तो सब कुछ।
फ़र्ज़ की चलती नहीं बात,क्या किया जाए ।।

क़ायदों की यहाँ परवाह किसे है यारब।
तोड़ना फ़ख़्र की है बात, क्या किया जाए।।

हर तरफ दिख रहा समाज का अपराधीकरण।
लोग कहते इसे विकास, क्या किया जाए ।।

हमारी बेहतरी से बेहतर,उसकी बर्बादी।
..गोपाल..है मज़े की बात ,क्या किया जाए।।

Sunday, July 22, 2012

कैद लगती है, सजा लगती है..............

कैद लगती है, सजा लगती है ।
जिन्दगी अब बेमजा लगती है

सुकूने-दिल कहाँ तलाश करें।
बहार भी अब खिजा लगती है।।

हर तरफ आलमे-बेसब्री है।
घुटन भरी सी फिजा लगती है।।

रिश्ते अब निभने को मोहताज लगें।
बात पहले सी, कहाँ लगती है  ।।

कौन से मोड.पर आपहुँचे हम।
अजनबी हर सै जहाँ लगती है।।

किससे पूछें अब यहाँ अपना पता।
सारी दुनियाँ गुमशुदा लगती है ।।

चलो ..गोपाल..अब उस राह चलें।
जाके हर राह  जहाँ लगती है ।।