चहुँदिशि भ्रष्टाचार की,मची हुई है धूम।
जिधर भी देखो उठ रही,घोटालों की गूँज।।
कालीनों पर फिसल कर,करते रोज विकास।
पैसा गया स्विस् बैंक में,हमको दें विश्वास।।
इक़ दिन क़िस्मत् देश की,देगें बदल हुज़ूर।।जिधर भी।।
अधिकारों का दुरुपयोग,अब है सत्ता का खेल।
नेता-अफ़सर ताल-मेल से,खेल रहे यही खेल।।
जीयो और जीने दो,इनका यही मन्त्र है मूल।।जिधर भी।।
चारा हो,बोफोर्स हो, या फिर हो ताबूत् ।
टू जी,थ्री जी,सी डब्लू जी,निगल गए सबकुछ।।
जाँच करो,आयोग बिठादो,करते रहो जो कुछ।।जिधर भी।।
उपजाए बहु-विधि फसल,जोत-जोत कर खेत।
कल भी आधा पेट था,आज भी आधा पेट ।।
क्या बदला उसके लिए,जान ले गई भूख।।जिधर भी।।
अब हर आम इन्सान का,आज है बस् यही हाल।
घिसट-घिसट जीवन कटे, रोटी-दाल मुहाल ।।
रबड़ी नेताजी चखें, ऐँठ-ऐँठ कर मूँछ ।। जिधर भी।।
बनना है धनवान तो,देश की चिन्ता छोड़।
ईमानदारी,सच्चाई और फ़र्ज़ से तू मुँह मोड़।।
नेता बन,क़िस्मत् बदल,राजनीति में कूद ।।जिधर भी।।
वो थे निपट नादान जो देश पे दे गए ज़ान ।
माँ-बापू,बीबी-बच्चों की,तनिक न की परवाह।।
आज उनके सपनों की होली,जलती है धू-धू।।जिधर भी।।
देश की अस्मत् बेच-बेच कर,बना रहे हैं माल।
मर्यादाओं, आदर्शों का, पाले कौन बवाल ?
देश की क्या "गोपाल"को, मची हुई है लूट ।।जिधर भी।।
Saturday, January 8, 2011
Thursday, December 23, 2010
अब इसे बन्द करो........
किसका मन्दिर,किसकी मस्ज़िद,अब इसे बन्द करो।
बहुत हुई ये सियासत्, अब इसे बन्द करो ।।
सारी दुनियाँ जो सम्भाले, उसे सम्भालोगे ?
छोड़ो ये फ़र्ज़ी हिफ़ाज़त्,अब इसे बन्द करो ।।
सारी धरती है उसीकी, कहाँ नहीं है वो ?
तेरी-मेरी की वक़ालत्,अब इसे बन्द करो।।
नशाए-मज़हब में, इन्सानियत् को मत् भूलो !
बस् अब बदलो अपनी नीयत्,अब इसे बन्द करो।।
कुछ तो ऐसा करो, हर रूह को राहत् पहुँचे।
जेहादो-जंग की फ़ितरत्,अब इसे बन्द करो।।
जियो सुकून से, सबको सुकूँ से जीने दो ।
लग रही क़ौम पे तोहमत्,अब इसे बन्द करो।।
यहाँ के ना हुए, तो ख़ाक़ वहाँ जाओगे ?
कहाँ"गोपाल"पे रहमत्,अब इसे बन्द करो।।
बहुत हुई ये सियासत्, अब इसे बन्द करो ।।
सारी दुनियाँ जो सम्भाले, उसे सम्भालोगे ?
छोड़ो ये फ़र्ज़ी हिफ़ाज़त्,अब इसे बन्द करो ।।
सारी धरती है उसीकी, कहाँ नहीं है वो ?
तेरी-मेरी की वक़ालत्,अब इसे बन्द करो।।
नशाए-मज़हब में, इन्सानियत् को मत् भूलो !
बस् अब बदलो अपनी नीयत्,अब इसे बन्द करो।।
कुछ तो ऐसा करो, हर रूह को राहत् पहुँचे।
जेहादो-जंग की फ़ितरत्,अब इसे बन्द करो।।
जियो सुकून से, सबको सुकूँ से जीने दो ।
लग रही क़ौम पे तोहमत्,अब इसे बन्द करो।।
यहाँ के ना हुए, तो ख़ाक़ वहाँ जाओगे ?
कहाँ"गोपाल"पे रहमत्,अब इसे बन्द करो।।
Sunday, December 5, 2010
ग़ुजिस्ता दौर......
गुजिस्ता दौर गया, देके ये पैग़ाम हमें।
कि शराफत् ही अपनी कर गई नाकाम हमें।।
तमाम ज़िन्दग़ी, सफ़र में खप गई यूँ ही।
मग़र मिला ना कोई मन्ज़िलो-मुक़ाम् हमें।।
मेरे सिवाय,बदल गया ये ज़माना,फिर भी।
बदल गये जो,बदलने का दें इल्ज़ाम् हमें।।
जिनको रुसवा नहीं होने दिया हमने वो ही।
जाने क्यों? करते फिरें,ख़्वामोख़्वा बदनाम हमें।।
अपनी बेअक़्ली पे, हम आज़ बहुत हैराँ हैं।
जिसे पहचान दी,उसने किया बेनाम हमें।।
जिसे आँखों में बसाया,सजाया सीने में।
चला गया वही, करके लहूलुहान हमें।।
अजब दस्तूर है..गोपाल..इस ज़माने का।
सभी ग़रज़ पे ही,करते फिरें सलाम हमें।।
कि शराफत् ही अपनी कर गई नाकाम हमें।।
तमाम ज़िन्दग़ी, सफ़र में खप गई यूँ ही।
मग़र मिला ना कोई मन्ज़िलो-मुक़ाम् हमें।।
मेरे सिवाय,बदल गया ये ज़माना,फिर भी।
बदल गये जो,बदलने का दें इल्ज़ाम् हमें।।
जिनको रुसवा नहीं होने दिया हमने वो ही।
जाने क्यों? करते फिरें,ख़्वामोख़्वा बदनाम हमें।।
अपनी बेअक़्ली पे, हम आज़ बहुत हैराँ हैं।
जिसे पहचान दी,उसने किया बेनाम हमें।।
जिसे आँखों में बसाया,सजाया सीने में।
चला गया वही, करके लहूलुहान हमें।।
अजब दस्तूर है..गोपाल..इस ज़माने का।
सभी ग़रज़ पे ही,करते फिरें सलाम हमें।।
Wednesday, December 1, 2010
हमसा "आवारा" ना मिला.....
मांगने निकले,सहारा ना मिला।
हमें समझे,वो हमारा ना मिला।।
जिसे महसूस किया,दिल के क़रीब।
ऐसा बिछड़ा,कि दुबारा ना मिला ।।
हम भी तूफ़ान से बच जाते,मग़र।
कोई मौसम का ईशारा,ना मिला।।
सारी दुनियाँ में, ढूंढ कर देखा ।
..गोपाल..हमसा"आवारा"ना मिला।।
हमें समझे,वो हमारा ना मिला।।
जिसे महसूस किया,दिल के क़रीब।
ऐसा बिछड़ा,कि दुबारा ना मिला ।।
हम भी तूफ़ान से बच जाते,मग़र।
कोई मौसम का ईशारा,ना मिला।।
सारी दुनियाँ में, ढूंढ कर देखा ।
..गोपाल..हमसा"आवारा"ना मिला।।
Saturday, November 27, 2010
मेरी ज़िन्दग़ी के पीछे......
है कारवाँ ग़मों का,मेरी ज़िन्दग़ी के पीछे।
छुपे दर्द हैं हज़ारों,मेरी इक हँसी के पीछे।।
अश्के-लहू ढले हैं,बरसों मेरी नज़र से।
तरसा है मुद्दतों दिल,इक पल ख़ुशी के पीछे।।
हम दर्द के मारों को,तेरा प्यार ही था मरहम्।
कहीं दम् निकल न जाए,तेरी बेरुख़ी के पीछे।।
इतने बड़े जहाँ में, हम ही कमनसीब ठहरे।
हम तेरे पीछे-पीछे,तू और किसी के पीछे ।।
जो ख़ता हुई हो हमसे,मेरी जान माफ़ कर दो।
दुनियाँ भुलादी हमने, तेरी गली के पीछे ।।
तू है मरी इबादत्, तू मेरी आरज़ू है ।
लाखों सितम् सहे हैं,तेरी दोस्ती के पीछे।।
ये क्या सफ़र है? जिसकी,मन्ज़िल भी ख़ुद सफ़र है।
बनके हमसफ़र है..गोपाल..,सफ़र ज़िन्दग़ी के पीछे।।
छुपे दर्द हैं हज़ारों,मेरी इक हँसी के पीछे।।
अश्के-लहू ढले हैं,बरसों मेरी नज़र से।
तरसा है मुद्दतों दिल,इक पल ख़ुशी के पीछे।।
हम दर्द के मारों को,तेरा प्यार ही था मरहम्।
कहीं दम् निकल न जाए,तेरी बेरुख़ी के पीछे।।
इतने बड़े जहाँ में, हम ही कमनसीब ठहरे।
हम तेरे पीछे-पीछे,तू और किसी के पीछे ।।
जो ख़ता हुई हो हमसे,मेरी जान माफ़ कर दो।
दुनियाँ भुलादी हमने, तेरी गली के पीछे ।।
तू है मरी इबादत्, तू मेरी आरज़ू है ।
लाखों सितम् सहे हैं,तेरी दोस्ती के पीछे।।
ये क्या सफ़र है? जिसकी,मन्ज़िल भी ख़ुद सफ़र है।
बनके हमसफ़र है..गोपाल..,सफ़र ज़िन्दग़ी के पीछे।।
Friday, November 19, 2010
क्या कीजिए.....
जहाँ अपने ही इतने ख़तरनाक़ हों,वहाँ गैरों पे इल्ज़ाम क्या दीजिए।
ख़ून ही अपना जब बन गया हो ज़हर,तो दवाओं से उम्मीद क्या कीजिए।।
जब नशेमन हमारा जलाया गया,हाथ सेंका था सबने बड़े शौक़ से।
क्या बताएँ कि हम ख़ाक़ हो ना सके,बच गए ज़िन्दग़ी थी तो क्या कीजिए।।
जो विधाता की मर्ज़ी थी,बस् वो हुआ,उनकी रहमत् के आगे है..गोपाल..क्या।
हमने झेले बहुत ज़िन्दग़ी के सितम,और भी झेल लेंगे दुआ कीजिए ।।
ख़ून ही अपना जब बन गया हो ज़हर,तो दवाओं से उम्मीद क्या कीजिए।।
जब नशेमन हमारा जलाया गया,हाथ सेंका था सबने बड़े शौक़ से।
क्या बताएँ कि हम ख़ाक़ हो ना सके,बच गए ज़िन्दग़ी थी तो क्या कीजिए।।
जो विधाता की मर्ज़ी थी,बस् वो हुआ,उनकी रहमत् के आगे है..गोपाल..क्या।
हमने झेले बहुत ज़िन्दग़ी के सितम,और भी झेल लेंगे दुआ कीजिए ।।
Saturday, September 18, 2010
कितने नादाँ हो.....
कितने भोले हो,कितने नादाँ हो।
तुम नहीं जानते कि तुम क्या हो।।
तुम्हें पता नहीं ख़ुद की क़ीमत।
किसी के दिल हो,ज़िग़र हो,जाँ हो।।
क़द्र हीरे की, जौहरी जाने ।
ये ज़रूरी नहीं,सबको पता हो।।
ये ज़माना, अजीब जालिम है।
न दे, जिसकी जिसे तमन्ना हो।।
यूँ ही मिलजाए किसी को,जिसने।
भले उसकी क़दर न जाना हो ।।
बहाए कोई यूँ ही , गंगाजल ।
और कोई रूह-रूह प्यासा हो ।।
जहाँ के वास्ते, तुम "आम" होगे।
..गोपाल..के लिए,नूरे-ख़ुदा हो।।
तुम नहीं जानते कि तुम क्या हो।।
तुम्हें पता नहीं ख़ुद की क़ीमत।
किसी के दिल हो,ज़िग़र हो,जाँ हो।।
क़द्र हीरे की, जौहरी जाने ।
ये ज़रूरी नहीं,सबको पता हो।।
ये ज़माना, अजीब जालिम है।
न दे, जिसकी जिसे तमन्ना हो।।
यूँ ही मिलजाए किसी को,जिसने।
भले उसकी क़दर न जाना हो ।।
बहाए कोई यूँ ही , गंगाजल ।
और कोई रूह-रूह प्यासा हो ।।
जहाँ के वास्ते, तुम "आम" होगे।
..गोपाल..के लिए,नूरे-ख़ुदा हो।।
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