Friday, May 28, 2010

डोर साँसों की ये ज़िन्दग़ी है....

डोर साँसों की ये ज़िन्दग़ी है, कौन जाने कि कब टूट जाए।
जाने किस मोड़ पर किसका दामन,किसके हाथों से कब छूट जाए।।

जितनी मिल जाएँ खुशियाँ मनालो,
ग़म भी आए तो हँस के उठालो।
ज़िन्दग़ी खूबसूरत बनालो, ये सफ़र बाख़ुशी बीत जाए।।

वक़्त के साथ चलते ही जाओ।
वक़्त को बेवजह ना गवाँओ ।
है ये मुमक़िन नहीं ज़िन्दग़ी में,वक़्त ग़ुज़रा हुआ लौट आए।।

चाहे जितना घना हो अन्धेरा।
रोक सकता नहीं ये सवेरा ।
तोड़कर उस अन्धेरे की सतहें,रोशनी की किरन फूट आए।।

ज़िन्दग़ी बस् उम्मीदों के बल पर।
काट लेता है इन्साँ, तरस कर ।
नाउम्मीदी का लम्हा भी..गोपाल..मौत से पहले ही मौत लाए।।

2 comments:

  1. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. लेकिन अभी तो कुछ मिला भी नही है।................

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