Sunday, December 5, 2010

ग़ुजिस्ता दौर......

गुजिस्ता दौर गया, देके ये पैग़ाम हमें।
कि शराफत् ही अपनी कर गई नाकाम हमें।।

तमाम ज़िन्दग़ी, सफ़र में खप गई यूँ ही।
मग़र मिला ना कोई मन्ज़िलो-मुक़ाम् हमें।।

मेरे सिवाय,बदल गया ये ज़माना,फिर भी।
बदल गये जो,बदलने का दें इल्ज़ाम् हमें।।

जिनको रुसवा नहीं होने दिया हमने वो ही।
जाने क्यों? करते फिरें,ख़्वामोख़्वा बदनाम हमें।।

अपनी बेअक़्ली पे, हम आज़ बहुत हैराँ हैं।
जिसे पहचान दी,उसने किया बेनाम हमें।।

जिसे आँखों में बसाया,सजाया सीने में।
चला गया वही, करके लहूलुहान हमें।।

अजब दस्तूर है..गोपाल..इस ज़माने का।
सभी ग़रज़ पे ही,करते फिरें सलाम हमें।।

1 comment:

  1. निजी तौर से दर्द के फलसफे हमें जमते नहीं, बाकी आपका अंदाज़े-बयाँ बड़ा दिलचस्प है.
    लिखते रहिये.

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