कैसा इंसान है ? यूँ शोर न कर ।
परिन्दे हैं, उड़ जएंगे ॥
मासूम,देख के कुछ दाने चले आए हैं।
पेट की आग बुझा लेंगे ,चले जाएँगे ॥
नहीं करना है इनको क़ब्ज़ा किसी के हक् पर।
किसी भी आँगन , चौबारे से , गुज़र जाएंगे ॥
वैसे भी तूने कहाँ छोड़ा ,किसी का हिस्सा ।
जो जाके और भी कहीं पे उतर जाएँगे॥
ज़मीनों-ज़र ,दरो- दरख़्त, समन्दरो-आकाश।
सब तेरे हैं तो ये मज़लूम किधर जाएँगे?।
कुछ तो इंसानियत् का भरम बचा रहने दे।
वरना परिन्दे क्या,इंसान भी डर जाएँगे ॥
