किसका रोना रोने जाओ, किसकी बात करो।
इस दुनियाँ में,ऱब से कम,इन्सान से ज्यादा डरो।।
रब तो, जैसी करनी तेरी,वैसा फल देगा।
पर इन्साँ चाहेगा तो,बिना कर्म के फल देगा।
और किसी के कर्मों का हर्जाना आप भरो ।। इस दुनियाँ में।।
अच्छाई का बदला,बेशक्!रब अच्छा देगा।
पर इन्साँ की मर्ज़ी पर है, जो चाहे देगा।
सबकुछ उसके मूड पे है,तुम जीओ,चाहे मरो।। इस दुनियाँ में।।
क़दम-क़दम पे जाल बिछा है,किधर से निकलोगे?
मौका तो दे दो, फ़िर देखो, ख़ुद पर रोओगे ।
आज तो रब ख़ुद हैराँ है,..गोपाल..क्या आह भरो।। इस दुनियाँ में।।
Friday, July 23, 2010
Thursday, July 15, 2010
मिल जाया करेंगे यूँ ही,जीवन के सफ़र में....
मिल जाया करेंगे यूँ ही, जीवन के सफ़र में ।
किस रस्ते पे,किस मोड़ पे,ये कह नहीं सकता।।
वैसे भी, हरेक बात का वादा, नहीं अच्छा ।
कल कौन कहाँ हो,ये कोई कह नहीं सकता।।
दिल में, ज़रा सी जगह, मेरे वास्ते रखिए ।
मैं वक़्त नहीं ग़ुज़रा,जो फिर आ नहीं सकता।।
आने की ख़ुशी कैसी,क्या है मिलन का एहसास।
अब!उसको क्या पता,जो कभी जा नहीं सकता।।
किस रस्ते पे,किस मोड़ पे,ये कह नहीं सकता।।
वैसे भी, हरेक बात का वादा, नहीं अच्छा ।
कल कौन कहाँ हो,ये कोई कह नहीं सकता।।
दिल में, ज़रा सी जगह, मेरे वास्ते रखिए ।
मैं वक़्त नहीं ग़ुज़रा,जो फिर आ नहीं सकता।।
आने की ख़ुशी कैसी,क्या है मिलन का एहसास।
अब!उसको क्या पता,जो कभी जा नहीं सकता।।
Thursday, July 8, 2010
जाने क्यूँ बात चली......
की है तन्हाई से बातें पहरों,सुनी है शोर ख़ामोशी की तमाम।
छटपटाती हुई सुबहें कितनी,और सिसकती हुई देखी है शाम।
ग़म से बेज़ार दोपहर देखी, रात रोती हुई मायूस, नाकाम ।
बन्द कमरे में बेबसी के पल,कटती बेमकसद् ज़िन्दग़ी तमाम।।
*******************************************
फिर तेरा जिक्र छिड़ा,फिर तेरी बात चली।
दिल में एक हूक उठी,आह बनकर निकली।।
ख्याल बनके उठे, तुम छा गए दिल पर ।
धूल यादों की उड़ी, फिर तमन्ना मचली ।।
पुराने ज़ख्म खुले, बहा फिर खूँ दिल का ।
ग़म के बादल घुमड़े, झड़ी आँसू की चली।।
बहल चला था दिल,मचल उठा..गोपाल..।
अब सम्भालूँ कैसे , जाने क्यूँ बात चली ।।
छटपटाती हुई सुबहें कितनी,और सिसकती हुई देखी है शाम।
ग़म से बेज़ार दोपहर देखी, रात रोती हुई मायूस, नाकाम ।
बन्द कमरे में बेबसी के पल,कटती बेमकसद् ज़िन्दग़ी तमाम।।
*******************************************
फिर तेरा जिक्र छिड़ा,फिर तेरी बात चली।
दिल में एक हूक उठी,आह बनकर निकली।।
ख्याल बनके उठे, तुम छा गए दिल पर ।
धूल यादों की उड़ी, फिर तमन्ना मचली ।।
पुराने ज़ख्म खुले, बहा फिर खूँ दिल का ।
ग़म के बादल घुमड़े, झड़ी आँसू की चली।।
बहल चला था दिल,मचल उठा..गोपाल..।
अब सम्भालूँ कैसे , जाने क्यूँ बात चली ।।
Wednesday, June 30, 2010
हम भी आदमजात हैं....
इतना क्या काफी नहीं कि हम भी आदमजात हैं।
पास अपने भी है दिल,हैं धड़कनें,जज़्बात् हैं ।।
ज़िन्दग़ी का हक़्,हमें भी,कुछ तो मिलना चाहिए।
हमभी बन्दे हैं उसीके, जिसकी कायेनात् है ।।
हर सुबह को देखते हैं, हम बड़े उम्मीद से ।
शाम तक पाते हैं कि बस् एक से हालात् हैं।।
रखलो अपने पास तुम, सारे जहाँ की नेमतें।
पर हमारी रोटियाँ भी छीनलो,कोई बात है!?
वैसे तेरे साथ,अपनी हैसियत् ही क्या रही!
जेब में खोटी अठन्नी,बस् यही औकात् है।।
हैसियत् ऊँची हुई, इन्सान छोटे हो गये ।
क्या कहें..गोपाल..किसको,हर ग़ली की बात है।।
पास अपने भी है दिल,हैं धड़कनें,जज़्बात् हैं ।।
ज़िन्दग़ी का हक़्,हमें भी,कुछ तो मिलना चाहिए।
हमभी बन्दे हैं उसीके, जिसकी कायेनात् है ।।
हर सुबह को देखते हैं, हम बड़े उम्मीद से ।
शाम तक पाते हैं कि बस् एक से हालात् हैं।।
रखलो अपने पास तुम, सारे जहाँ की नेमतें।
पर हमारी रोटियाँ भी छीनलो,कोई बात है!?
वैसे तेरे साथ,अपनी हैसियत् ही क्या रही!
जेब में खोटी अठन्नी,बस् यही औकात् है।।
हैसियत् ऊँची हुई, इन्सान छोटे हो गये ।
क्या कहें..गोपाल..किसको,हर ग़ली की बात है।।
Sunday, June 27, 2010
इन्साफ़ इसका अन्धा.....
इन्साफ़ इसका अन्धा,क़ानून बेसहारा।
सारे जहाँ से अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा।।
क़ानून के हैं बाजू ,ये ख़ाक़ी वर्दी वाले।
रिश्वत् बग़ैर किसकी है मज़ाल कुछ कराले।।
इन्सान क्या है,इनसे भगवान भी है हारा।। सारे जहाँ....
य़े काले कोट वाले,इन्साफ़ की हैं आँखें।
सच्चाई इनको रोती,इन्साफ़ बेच खाते।।
इनसे लहू-लुहाँ है, क़ानून की हर धारा।। सारे जहाँ....
जिनकी क़लम से छूटे,तलवार को पसीना।
हर रोज चीरते हैं, इन्साफ़ का ये सीना ।।
ये पत्रकार,फिरभी इन्साफ़ इनका नारा ।। सारे जहाँ....
हैं देश को चलाते, नेताजी खादी वाले ।
करते हैं नित् घोटाले,बोफोर्स और हवाले।।
स्कूटर पे लाते,नौ सौ करोड़ का ये चारा।। सारे जहाँ....
इतने ही नहीं, जाने हैं और कितने सारे।
हैं नोच रहे,"सोने की चिंड़िया"के पंख प्यारे।।
..गोपाल..दिलादो याद इन्हें,इतिहास तो हमारा।। सारे जहाँ....
(ये मेरा व्यक्तिगत् विचार है,इसके अपवाद् भी हैं)
सारे जहाँ से अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा।।
क़ानून के हैं बाजू ,ये ख़ाक़ी वर्दी वाले।
रिश्वत् बग़ैर किसकी है मज़ाल कुछ कराले।।
इन्सान क्या है,इनसे भगवान भी है हारा।। सारे जहाँ....
य़े काले कोट वाले,इन्साफ़ की हैं आँखें।
सच्चाई इनको रोती,इन्साफ़ बेच खाते।।
इनसे लहू-लुहाँ है, क़ानून की हर धारा।। सारे जहाँ....
जिनकी क़लम से छूटे,तलवार को पसीना।
हर रोज चीरते हैं, इन्साफ़ का ये सीना ।।
ये पत्रकार,फिरभी इन्साफ़ इनका नारा ।। सारे जहाँ....
हैं देश को चलाते, नेताजी खादी वाले ।
करते हैं नित् घोटाले,बोफोर्स और हवाले।।
स्कूटर पे लाते,नौ सौ करोड़ का ये चारा।। सारे जहाँ....
इतने ही नहीं, जाने हैं और कितने सारे।
हैं नोच रहे,"सोने की चिंड़िया"के पंख प्यारे।।
..गोपाल..दिलादो याद इन्हें,इतिहास तो हमारा।। सारे जहाँ....
(ये मेरा व्यक्तिगत् विचार है,इसके अपवाद् भी हैं)
Thursday, June 24, 2010
बुलन्द हक़ की तुम आवाज़ करोगे कैसे?...
बुलन्द,हक़ की तुम आवाज़ करोगे कैसे ?
ज़ुल्म का, बढ़ के एतराज़ करोगे कैसे ?।
हरेक अन्जाम भुगतने का न माद्दा हो अगर।
ये बताओ कि फिर आग़ाज़ करोगे कैसे ?।
दिल में,तूफ़ान से टकराने का जज़्बा ही नहीं।
खुले आकाश में, परवाज़ करोगे कैसे ?।
यूँ समन्दर की जो गहराईयों से डरते रहे।
फ़िर कहो! साहिलों पे राज करोगे कैसे?।
..गोपाल..यूँ रही आदत,जो डर के जीने की।
खुद को साबित, एक जाँबाज़ करोगे कैसे ?।
ज़ुल्म का, बढ़ के एतराज़ करोगे कैसे ?।
हरेक अन्जाम भुगतने का न माद्दा हो अगर।
ये बताओ कि फिर आग़ाज़ करोगे कैसे ?।
दिल में,तूफ़ान से टकराने का जज़्बा ही नहीं।
खुले आकाश में, परवाज़ करोगे कैसे ?।
यूँ समन्दर की जो गहराईयों से डरते रहे।
फ़िर कहो! साहिलों पे राज करोगे कैसे?।
..गोपाल..यूँ रही आदत,जो डर के जीने की।
खुद को साबित, एक जाँबाज़ करोगे कैसे ?।
Monday, June 21, 2010
सोचा है, किसी और से अपना दर्द बाँटेंगे....
मौत बन-बन के मुझे, ज़िन्दग़ी सताती है।
मौत आती नहीं,बस्! याद उनकी आती है।।
चैन आता है कहाँ ? नींद कहाँ आती है ?
अब तो बस्! साँस आती है,साँस जाती है।।
**********************************
दिल में जज़्ब रखेंगे,ख़ुद झेलेंगे,काटेंगे।
सोचा है,किसी और से अपना दर्द न बाँटेंगे।।
किसी के हँसते-खिलते चेहरे पर,क्यों ग़म मल दें?
क्यों किसी और को अपने कर्म और क़िस्मत् का फल दें?
बो रखी है फ़सल जो ग़म की, दर्द ही काटेंगे।। सोचा है....
जिसका जितना भी हक़ हमपे,अदा तो करना है।
इसके पीछे जो भी ग़ुज़रे, हँस के सहना है ।
नहीं करेंगे ग़िला कोई,ना मोहलत् मांगेंगे।। सोचा है....
दिल में ज़्यादा दर्द उठा तो थोड़ा रो लेंगे।
दाग़ हसरतों के सारे,अश्क़ों से धो लेंगे ।
वक़्त हो कितना भी भारी,हम तन्हाँ काटेंगे।। सोचा है....
सतरंगे सपनों के, सभी घरौंदे टूट गए ।
समय की पग़डन्डी में,बरसों पीछे छूट गए।
अब..गोपाल..के बस में क्या,जो वापस लौटेंगे।।सोचा है....
मौत आती नहीं,बस्! याद उनकी आती है।।
चैन आता है कहाँ ? नींद कहाँ आती है ?
अब तो बस्! साँस आती है,साँस जाती है।।
**********************************
दिल में जज़्ब रखेंगे,ख़ुद झेलेंगे,काटेंगे।
सोचा है,किसी और से अपना दर्द न बाँटेंगे।।
किसी के हँसते-खिलते चेहरे पर,क्यों ग़म मल दें?
क्यों किसी और को अपने कर्म और क़िस्मत् का फल दें?
बो रखी है फ़सल जो ग़म की, दर्द ही काटेंगे।। सोचा है....
जिसका जितना भी हक़ हमपे,अदा तो करना है।
इसके पीछे जो भी ग़ुज़रे, हँस के सहना है ।
नहीं करेंगे ग़िला कोई,ना मोहलत् मांगेंगे।। सोचा है....
दिल में ज़्यादा दर्द उठा तो थोड़ा रो लेंगे।
दाग़ हसरतों के सारे,अश्क़ों से धो लेंगे ।
वक़्त हो कितना भी भारी,हम तन्हाँ काटेंगे।। सोचा है....
सतरंगे सपनों के, सभी घरौंदे टूट गए ।
समय की पग़डन्डी में,बरसों पीछे छूट गए।
अब..गोपाल..के बस में क्या,जो वापस लौटेंगे।।सोचा है....
Subscribe to:
Posts (Atom)
