Monday, January 18, 2010

किसे सुनाएँ हाले-दिल़....

अब तो खामोशी भली,लब़ पे लगालें ताला।
किसे सुनाएँ हाले-दिल़,कौन सुनने वाला।।

चन्द सिक्कों की खनक़ में,सभी हुए बहरे।
दौड़ती-भागती दुनियाँ, कहाँ जाने ठहरे।
अभी ये सिल़सिला,लगता नहीं रुकने वाला।। किसे सुनाएँ...

जिसे भी देखिये,हक़ से ज़ियादे की धुऩ है।
किसे बेचें,क्या खरीदें, यही उधेड़-बुऩ है।
ऐसे बेचैनी के आलम़ में,कौन फुर्सत् वाला।। किसे सुनाएँ...

मरते ज़मीर,उसूल, गैरतो-ज़ज्बात् मिले।
महात्वाकांकांक्षा,कपट और स्वार्थ साथ मिले।
फ़ायदे के लिये,सबकुछ यहाँ बिकने वाला।। किसे सुनाएँ...

प्रेम-सद़्भाव,नैतिकता, इन्सानिय़त् न कहीं।
दिल़ की बस्ती में वीराना है,कोई आहट़ न कहीं।
है यहाँ कौन तेरा दर्द समझने वाला।। किसे सुनाएँ...

छोड़ो बेदर्द़ ज़माने से ग़िला क्या करना।
बेज़ान बुत़् में ज़िन्दगी तलाश़ क्या करना।
..गोपाल..इन पत्थरों में दिल़ नहीं मिलने वाला।। किसे सुनाएँ...

Sunday, January 10, 2010

क्यूँ है....

वादे पे किसी के अब भी, एतबार सा क्यूँ है।
दिल़ आज़ भी किसी का तलबग़ार सा क्यूँ है।।

यूँ तो हमें नहीं है,किसी का भी इन्तजाऱ।
फिर भी ये दिल़ न जाने,बेक़रार सा क्यूँ है।।

अब़ तो किसी आहट़ पे नहीं चौंकते हैं हम।
फिर भी कहीं इक़ भरम बरक़रार सा क्यूँ है।।

है ज़िन्दगी जबकि नाउम्मीदी के हवाले।
उम्मीद़ के घोड़े पे,दिल़ सवार सा क्यूँ है।।

हर चेहरे को पहचानते फिरते हैं हम..गोपाल..।
अब भी वही चेहरा,हमें दरक़ार सा क्यूँ है।।

Saturday, January 9, 2010

तमन्ना किये हुए....

रहने लगा है , सबसे फासला किये हुए।
जबसे है दिल़ ग़मों से राबिता किये हुए।।

बेचैनी सारी खत्म हुई , बेखुदी गई।
हैं दर्द को जिस दिन से हम दवा किये हुए।।

अब तो यहाँ ना शोर,ना कोहराम़ है कोई।
जबसे गया तूफाऩ , बियाबाँ किये हुए।।

मुद्द़त् हुई,सजे यहाँ,कोई ज़श्ऩ-ए-महफिल़।
बरसों ग़ुजर गये हैं , चिरागाँ किये हुए।।

मिलने की आरज़ू में,ज़िन्दगी गुज़ार दी।
वो हैं कि ग़ुजर जाते हैं,पर्दा किये हुए।।

एक बार भी,जो मेरा कहा मान जाते वो।
..गोपाल..कबसे है,ये तमन्ना किये हुए।।

इस राह पे लाकर....

फिर दर्द का तूफान,जवाँ कर गया कोई।
ठहरी हुई इक़ मौज़ रवाँ कर गया कोई।।

वैसे ही गर्केयाब़ थी,किश्ती मेरे दिल़ की।
शैलाब और ग़म के,उठा कर गया कोई।।

यादों के आईने में,जो कुछ जम सी चली थी।
वो धूल वक्त़ की,फिर उड़ा कर गया कोई।।

ज़ख्मे-जिग़र जो सूख चला था,ज़रा-ज़रा।
फिर उसमें नयी टीस जगा कर गया कोई।।

यूँ देखता हुआ गुज़र गया हमें जैसे।
कि अज़नबी क़रीब से ग़ुजर गया कोई।।

हम भी वही,वो भी वही,बस् वक्त़ वो नहीं।
अपनी वफात् से,क्यूँ फिर,मुक़र गया कोई।।

..गोपाल..हमें ऐसी तो उम्मीद़ नहीं थी।
इस राह पे लाकर,अब उस डग़र गया कोई।।

Friday, January 8, 2010

तू ज़िन्दगी है..

मिल ज़ान,हकीक़त में या ख्वाबों में मिला कर।
ना मिल सके बेपरदा, हिज़ाबों में मिला कर।।

नज़रों के रास्ते, तुझे दिल़ में उतार लूँ।
तू बन के स़फा,हमसे क़िताबों में मिला कर।।

तू बन के खुशबू आजा,हवाओँ के संग-संग।
बन के बरस जा बूँद,घटाओँ में मिला कर।।

बन के तू मस्ती शाम़ की,सुबह की ताज़गी।
हर शाम़ में,सुबह की फिज़ाओँ में मिला कर।।

दुनियाँ के बन्दिशों की, न परवाह़ किया कर।
तू ज़िन्दगी है,रूह में ,साँसों में मिला कर।।

तेरे बग़ैर, कैसी हो तसव्वुरे-हयात़्।
जी लेंगे तुझे देख के,..गोपाल..मिला कर।।

तो ग़ज़ल कह बैठे....

ग़म की बारिश ने भिगोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।
दिल़ तेरी याद़ में रोया, तो ग़ज़ल कह बैठे।।

लगी गहराने तेरे दर्द की जब परछाईं।
तेरे सपनों की जब आँखों में मौज़ लहराई।
ख्याल़ जग उठा सोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।।दिल़ तेरी याद़..

किसी हसीन सी वादी से,जब कभी गुज़रे।
दिल़ की खिड़की खुली,बनके ख्याल़ तुम उभरे।
और हमें खुद़ में समोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।।दिल़ तेरी याद़..

सुरमई शाम हो,तनहाई हो,फुर्सत़ हो ज़रा।
भीनी-भीनी सी महक़ लेके सरसराई हव़ा।
दिल़ में नश्तऱ सा चुभोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।।दिल़ तेरी याद़..

नहाई चाँदनी में जब कभी भी रात हसीं।
दूर हलके से सुरों में,कहीं शहनाई बजी।
हमें नशे में डुबोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।।दिल़ तेरी याद़..

घिर के आईं जो कभी,मस्त घटाएँ काली।
हुई सावन की जो रिम-झिम़,दिल़ लुभाने वाली।
दिल़ तेरे सपनों में खोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।।दिल़ तेरी याद़..

क्या पता,शायरी क्या,मीऱ क्या और ग़ालिब़ क्या।
दिल़ में जज्बात़ कुछ मचले,..गोपाल..गुबाऱ उठा।
उन्हें लफ्जों में पिरोया,तो ग़ज़ल कह बैठे।। दिल़ तेरी याद़..

Thursday, January 7, 2010

प्यार-मुहब्बत़....

भूल जाओ और याद़ न रखो, कहना है आसान।
प्यार-मुहब्बत़ क्या समझे,कोई पत्थर-दिल़ इन्सान।।

ज़ान-बूझकर कोई किसी से प्यार नहीं है करता।
पहली नज़र में हो जाता है,ज़ादू दिल़ पर इसका।
चुपके से दिल़ का मेहमाँ,बन जाता कोई अनज़ान।। प्यार-मुहब्बत़।।

लगने लगते दिल़ को,जीवन के हर रंग सुहाने।
जीने का अन्दाज़ बदल जाता है, क्यूँ ना जाने।
होती दुनियाँ के सुन्दरता की असली पहचान ।। प्यार-मुहब्बत़।।

नहीं ज़रूरी है ये कि हम़ साथ गुज़ारें जीवऩ।
प्यार किया तो किया किसी को,करते रहेंगे हरदम़।
प्यार में कोई शर्त न होती,होता है बलिदाऩ ।। प्यार-मुहब्बत़।।

होती तऩ की हवस़ जहाँ,हो वहीँ जुनूँ पाने का।
प्याऱ नाम है देने का,और किसी के हो जाने का।
समझे प्यार हवस़ को जो,..गोपाल..बड़ा नादान।।प्यार-मुहब्बत़।।