Monday, January 4, 2010

आज़ के मज़नुओं ने....

आज़ के मज़नुओं ने,प्यार को सस्ता बना डाला।
किसी को भी थम्हादे,ऐसा गुल़दस्ता बना डाला ।।

बदल दी शक्लो-सूरत,रंगो-बू,पहचान यूँ इसकी।
कि हालत इस कद़र कुछ,प्यार का खस्ता बना डाला।।

अजी वो और थे,जो कर गये थे खुद़ा प्यार को।
पहाड़ों को भी जिसने चीरकर,रस्ता बना डाला ।।

आज-कल़ प्यार,एक फैशऩ की,नुमाईश की चीज़ है।
जो कल परदे में था,आज़ उसका ही परद़ा बना डाला।।

Sunday, January 3, 2010

चलो लौट चलें....

दूर तक अन्धेरा ही अन्धेरा है,चलो लौट चलें।
कितना सायूस़ सवेरा है , चलो लौट चलें ।।

गर्दिशे-वक्त़ की गुबार है, कुछ यूँ फैली ।
और तकदीऱ की चाद़र भी अपनी,है मैली।
बेऱहम धुन्ध ने घेरा है, चलो लौट चलें ।। कित़ना मायूस....

कहीं भी रोशनी नहीं,जहाँ तक जाती नज़र।
चलो अब छोड़कर चलें,ये अन्धेरों का शहऱ।
यहाँ खुद़ग़र्जी का डेरा है, चलो लौट चलें ।। कितना मायूस....

चलो वहीं फिर, जहाँ ज़िन्दग़ी नग़मे गाती।
जहाँ..गोपाल..सच्,इन्सानियत़,उम्मीद़ के साथी।
प्याऱ का दिल़ में बसेरा है, चलो लौट चलें ।। कितना मायूस....

दुनियाँ तेरी उस पार....

तू उलझा इस पार मुसाफिऱ,दुनियाँ तेरी उस पार।
बिऩ माली गुलश़न जैसा,तेरा सूना पड़ा संसार।।मुसाफिर दुनियाँ..

तेरे अपने रोते तुझ बिन,कटती रातें तारे गिन-गिन।
ओढ़ते आशा,बहाने बिछाते,आँसू पीते,सपने खाते ।
समय सरकता सिसक-सिसक कर,करते तेरा इन्तजार।।मुसाफिर दुनियाँ..

खोज़ रहा तू सुख के साधन,छोड़ आया पीछे सारा धन।
उन आँखों में आँसू भरकर,अपने दिल पर पत्थर रखकर।
सपनों के पीछे-पीछे , तू करता हाहाकार ।। मुसाफिर दुनियाँ..

सोच तनिक तूने क्या पाया,देख पलट के क्या छोड़ आया।
छोड़ दौड़ना दौड़ ये अन्धी,लौट जा,मुड़ जा,वापस अब भी।
हो जाए फिर से गुलशऩ..गोपाल..तेरा गुलज़ार ।। मुसाफिऱ दुनियाँ..

Saturday, January 2, 2010

जिन्दगी देखी....

ज़िन्दगी देखी--ज़िन्दगी के रंग देखे।
दुनियाँ देखी--दुनियाँ की रीति देखी।
अपने देखे--अपनों का प्य़ार देखा ।
बेग़ाने देखे--बेग़ानेपन की हद़ देखी।
दोस्त़ देखे--दोस्ती का म़कसद़ देखा।
दुश्मनी देखी--दुश्मनी की बुनिय़ाद देखी।
आद़मी देखा--आद़मी की औकात़ देखी।।

बुरा मान गये....

हाले-दिल़ पूछे,बताया,तो बुरा मान गये।
उन्हें यकीं भी दिलाया,तो बुरा मान गये।।
पायें-नाज़ुक न सऱ-आँखों पे जो लिया हमने।
सऱ ही सज़दे में झुकाया,तो बुरा मान गये।।
ढूंढते फिरते हैं वो दाग़, सबके चेहरों पे ।
आईना उनको दिखाया,तो बुरा मान गये।।
उछलते फिरते हैं वो,बनके ज़वानी की शान।
झुर्रियाँ याद़ दिलाया, तो बुरा मान गये ।।
हर घड़ी फायदे की बात,किया करते हैं।
फर्ज़ की बात चलाया,तो बुरा मान गये।।
अज़ीब सख्श हैं..गोपाल.. कोई ठीक नहीं।
हुए किस बात पे वो खुश,कब बुरा मान गये।।

Friday, January 1, 2010

दोस्त बन-बन के....

जब भी मिलते हो,दिल़ को ज़ख्म़ नया देते हो।
दोस्त बन-बन के तुम,हर बार द़गा देते हो ।।

तुम्हे एहसास़ ही क्या,दिल़ है क्या,जज्बात् है क्या।
गरज़ पे अपने,याद़ करते हो,भुला देते हो ।।

अपने मतलब़ के लिये,रंग बदलते हो तमाम़।
कहीं,किसी भी हद़ तक,खुद़ को गिरा देते हो।।

सुनाए तुमको ,कोई अपना हाले-दिल़ कैसे ।
..गोपाल..सुनने से पहले ही, सुना देते हो।।

कैसे मिटेंगे फासले....

जीवन के सफऱ में, निभाऊँ कैसे तेरा साथ।
तुम रुक नहीं सकते,मैं चल नहीं सकता ।।

कैसे समझ सकोगे तुम, हाले-दिल़ मेरा ।
तुम़ पूछ नहीं सकते, मै कह़ नहीं सकता।।

अपनी है कहानी, कुछ ज़मीं-आसमाँ जैसी।
ये उठ नहीं सकती, वो झुक़ नहीं सकता ।।

कैसे मिटेंगे फास़ले,..गोपाल..अपने बीच।
तुम़ आ नहीं सकते, मैं जा नहीं सकता ।।